मंगलवार, 15 मई 2018

मेरी अधूरी दास्ताँ

उफ्फ्फ ...ये जिंदगी भी न ... अजीब आँख मिचोली खेलती रहती है ...मेरी जिंदगानी के साथ...।...अक्सर किताबों में ...मैं प्रेम के अनेक प्रसंग...पढ़ती रहती थी...तब कहाँ पता था कि मेरी जिंदगी खुद कभी मुझे...वक़्त का दामन थाम मेरी जिंदगानी को ही एक किताब बनाने पर आमादा है।...वक्त के इरादे को मैं नासमझ ....कहाँ समझ सकी......।और अचानक तुम मिले और मैं .....यूँ ही...तो... बरबस तुम्हारे साथ एक...अनजाने राहों पे चल पड़ी....।बगैर कुछ सोचे.....समझे | हैं न....।तुम्हारा मिलना...वादों में मुझे खुद से ही खुद...को समर्पित करा लेना ...सब तो अचानक से ही हो गया था न...।और फिर तुमने...आहिस्ता से ही...तो अपनी प्रथम मंजिल को ... हासिल करने के लिए...खुद को दूसरी राहों के लिए मोड़ लिया ।तब से लेकर आज तक ...कुछ तो नही बदला...मेरे लिए...।जिस मोड़ पर तुम मुझे वादों की ...सतरंगी चूनर ओढ़ाकर...पलट गए थे...मैं वही पर अभी भी वक़्त की नब्ज पकडे...तुम्हारे इन्तजार में राह देखती रहती हूँ । तुम्हारे वादें... हर वक़्त ... मेरी उम्मीदों के दीये...की लौं को बुझने नही देते...।...पर मैं आखिर कब तक...वक़्त के बेरहम तूफां से ...इस दीये की ...लौं को...बुझने से बचाये रखूंगी...। मैं तो अक्सर तुम्हारे .प्रेम को ही जीती रही...तुम्हारे वादों को अपनी...ख्वाहिशों से सींचती रही हूँ ...तुम्हारी यादों को ... अपनी जिंदगी के लिए...संजीवनी बूटी बनाती रही हूँ ...पर अब मेरी हसरतें... न जाने कैसे किसी किताब के पन्ने ...की तरह ... स्याह रंग से ...रंगती जा रही है...। या फिर कहीं ऐसा तो नही कि मैं खुद में ही कहीं ... एक किताब की तरह...बनती जा रही हूँ...।
@ रश्मि

गुरुवार, 10 मई 2018

वो लम्हें

मैं और मेरी लेखनी ...!
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न जाने कैसे बहुत छोटी उम्र से ही ...ये लिखने की आदत हमें कहाँ से लग गई | बचपन में जब भी मैं कोई भी पंक्तियाँ या कुछ भी लिखती थी तो पारिवारिक परिवेश के कारण उसे छुपाकर ही रखने की कोशिश करती रहती ...ताकि कोई देख न ले | अगर कभी कुछ पंक्तियाँ किसी कागज के टुकडें पर लिखकर मैं भूल जाती थी और उसे कोई पढ़ लेता था तो फिर जैसे मुझ पर अपने कथित अपनों की तरफ से सवालों का तीर चलाया जाता था कि...क्यूँ लिखी हो ?...किसके लिए लिखी हो ?... हाँ ...यह दिगर बात है कि मेरी माँ को इससे कोई दिक्कत नही थी |दिक्कत तो मेरी चाचियों , मेरे चचेरे भाइयों व आन -बान-शान से लबरेज मेरे रिश्तेदारों को होती थी , जिन्हें यह लगता था कि ...कहीं मेरी इस लेखन कला के कारण उनकी इज्जत पे बट्टा न लग जाए | हमारे स्वं घोषित संस्कारी व महान परिवार में ... यह माना जाता था कि ...शायरियां तो मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान में रहने वाली लड़कियां या महिलायें ही करती हैं | पर यह मेरी खुशकिस्मती रही थी कि ...दुनिया की सबसे सुलझी हुई माँ का सानिध्य हमें मिला था , जो हमेशा मेरे लिए किसी भी परिस्तिथि में एक चट्टान की तरह मेरे साथ खड़ी रहती थी |माँ हमेशा बोलती थी कि...तुम्हें जो अच्छा लगता है वहीं करों |हाँ ,जिस उम्र में बच्चें -बच्चियां गुड्डे -गुड्डियों से खेलने में व्यस्त रहते हैं... उस उम्र में मेरी माँ मुझें रामायण -महाभारत की कहानियाँ अपने पास बैठाकर सुनाती थी |माँ का कहना था कि...किताबें ही हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं | वो मेरी माँ ही थी जिनके सतत प्रयास और न व्यक्त कर सकने वाले माहौल के बीच भी मैं बिहार के सबसे प्रतिष्ठित कोलज् से अपनी शिक्षा ग्रहण कर सकी | जानती हूँ मैं ...जिंदगी के हर मोड पर हमेशा मुझे साथ देने वाली मेरी वो दोस्त , सलाहकार और भगवान ...मेरी माँ इस दुनिया में मेरे साथ स्थूल रूप से मौजूद नही पर सूक्ष्मता के अनंत सीमाओं से परे वो हमेशा मेरे साथ कदमताल करती रहती हैं |
आप बहुत याद आती हो माँ ...एक बार फिर से दिख जाओं भी न कहीं से ....!
@ रश्मि

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

ख़ामोश लफ़्ज

आज मोहब्बत को ही मोहब्बत से....
                         
न जाने क्यूं फिर से मोहब्बत हो रही ...!

अजीब इतेफाक है यह तो सनम कि...

इन नजरों से फिर वहीं खता हो रही...!

@ रश्मि