उफ्फ्फ ...ये जिंदगी भी न ... अजीब आँख मिचोली खेलती रहती है ...मेरी जिंदगानी के साथ...।...अक्सर किताबों में ...मैं प्रेम के अनेक प्रसंग...पढ़ती रहती थी...तब कहाँ पता था कि मेरी जिंदगी खुद कभी मुझे...वक़्त का दामन थाम मेरी जिंदगानी को ही एक किताब बनाने पर आमादा है।...वक्त के इरादे को मैं नासमझ ....कहाँ समझ सकी......।और अचानक तुम मिले और मैं .....यूँ ही...तो... बरबस तुम्हारे साथ एक...अनजाने राहों पे चल पड़ी....।बगैर कुछ सोचे.....समझे | हैं न....।तुम्हारा मिलना...वादों में मुझे खुद से ही खुद...को समर्पित करा लेना ...सब तो अचानक से ही हो गया था न...।और फिर तुमने...आहिस्ता से ही...तो अपनी प्रथम मंजिल को ... हासिल करने के लिए...खुद को दूसरी राहों के लिए मोड़ लिया ।तब से लेकर आज तक ...कुछ तो नही बदला...मेरे लिए...।जिस मोड़ पर तुम मुझे वादों की ...सतरंगी चूनर ओढ़ाकर...पलट गए थे...मैं वही पर अभी भी वक़्त की नब्ज पकडे...तुम्हारे इन्तजार में राह देखती रहती हूँ । तुम्हारे वादें... हर वक़्त ... मेरी उम्मीदों के दीये...की लौं को बुझने नही देते...।...पर मैं आखिर कब तक...वक़्त के बेरहम तूफां से ...इस दीये की ...लौं को...बुझने से बचाये रखूंगी...। मैं तो अक्सर तुम्हारे .प्रेम को ही जीती रही...तुम्हारे वादों को अपनी...ख्वाहिशों से सींचती रही हूँ ...तुम्हारी यादों को ... अपनी जिंदगी के लिए...संजीवनी बूटी बनाती रही हूँ ...पर अब मेरी हसरतें... न जाने कैसे किसी किताब के पन्ने ...की तरह ... स्याह रंग से ...रंगती जा रही है...। या फिर कहीं ऐसा तो नही कि मैं खुद में ही कहीं ... एक किताब की तरह...बनती जा रही हूँ...।
@ रश्मि
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